सोशल मीडिया: स्वतंत्रता का आखिरी मंच या सत्ता का अगला निशाना?

भारत में इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया ने जहाँ पहले ही आत्मसमर्पण कर दिया, वहीं सोशल मीडिया स्वतंत्र विचारों का आखिरी मंच है। जानें कैसे सत्ता इस मंच को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है और हमारी जिम्मेदारी क्या है। 

मीडिया का आत्मसमर्पण

भारत में ज्यादातर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया ने तो बहुत पहले ही सरेंडर कर दिया था! क्योंकि उनके मालिक अपने व्यक्तिगत फायदे के लिए पहले से ही एक खास विचारधारा को सपोर्ट करते रहे थे। और बाद में उन्हें उसका फल भी मिला। यह स्थिति दर्शाती है कि कैसे मीडिया, जो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, ने अपनी स्वतंत्रता को निजी हितों के लिए दाँव पर लगा दिया।

सोशल मीडिया: स्वतंत्रता का आखिरी मंच



अब सोशल मीडिया को भी वो लोग अपने कंट्रोल में रखना चाहते हैं, जहाँ मेरे और आप जैसे लोग अपने विचार स्वच्छंद तरीके से रखते रहे हैं। क्योंकि अब यही आखिरी मंच बचा हुआ है। सोशल मीडिया वह जगह है जहाँ आम लोग बिना किसी डर के अपनी बात कह सकते हैं, और यह सत्ता के लिए चुनौती बन गया है।

सोशल मीडिया की ताकत

आपको याद ही होगा कि कैसे इस सोशल मीडिया का बखूबी प्रयोग अभी की पार्टी ने पिछली सरकार के खिलाफ किया था। पिछली सरकार की कमियाँ उजागर करने में सफल रही थी और सत्ता पाई थी। और वो इसलिए संभव था और है, क्योंकि सोशल मीडिया की पहुंच बहुत ज्यादा, सटीक और कारगर रही है। इसकी शक्ति ने सत्ता परिवर्तन को संभव बनाया, लेकिन अब वही शक्ति सवालों का कारण बन रही है।

सोशल मीडिया द्वारा सत्ता पर सवाल

अब जब वही सोशल मीडिया अभी के सत्ताधारी लोगों से सवाल कर रहा है, उन्हीं की जगाई उम्मीद को उनको ही याद दिला रही है, उनकी जिम्मेदारी तय करने की कोशिश कर रहा है, तो अब उसी सोशल मीडिया को ये करने से रोका जा रहा है। यह एक विडंबना है कि जिस मंच ने सत्ता दिलाई, उसी को अब चुप कराने की कोशिश हो रही है।

दबाव की रणनीति

अब सोशल मीडिया पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है कि वो सारे पोस्ट हटा दिए जाएँ, जिससे उस खास विचारधारा और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की पोल खुलती हो। मकसद एक ही है कि सवाल न पूछे कोई हमसे, हम जो कर रहे वहीं सही है। और उसमें भी सबसे खास बात ये है कि बादशाह सलामत की छवि किसी तरह खराब न हो जाए, भले वो कुछ करे या न करें।

आलोचना को चुप कराने की कोशिश

ये कुछ ऐसा है कि अपने कर्म सुधारने के बजाए आलोचकों का मुँह हमेशा के लिए बंद किया जा सके, जिससे उनके विरोध में कोई कुछ बोल ही नहीं पाए। यह रणनीति न केवल लोकतांत्रिक स्वतंत्रता को कमजोर करती है, बल्कि सवाल उठाने के अधिकार को भी कुचलने की कोशिश है।

बादशाह का काली करतूत  और दुनिया की आँखें

सोचने वाली बात ये है कि क्या बादशाह सलामत अपने चेचक का दाग छुपाने के लिए पूरी दुनिया की आँखें फोड़ देंगे? यह सवाल आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है, जहाँ सत्ता अपनी छवि को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। लेकिन क्या यह रणनीति सही है, और क्या यह लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं है?

हमारी जिम्मेदारी

क्या ये लोग इसमें कामयाब हो पाएंगे? इसका जवाब तो भविष्य तय करेगा! वो भी इस बात पर निर्भर करेगा कि आप और हम इसके लिए क्या करते हैं? हमारी अकर्मण्यता ही एक बार फिर उनकी जीत तय करेगी! अगर हम चुप रहे, तो यह मंच भी नियंत्रित हो सकता है। लेकिन अगर हम अपनी आवाज उठाते रहे, तो सोशल मीडिया स्वतंत्रता का प्रतीक बना रहेगा।

सोशल मीडिया आज हमारी स्वतंत्रता का आखिरी गढ़ है। इसे बचाना हमारी जिम्मेदारी है। अगर हम सवाल पूछना बंद कर देंगे, तो लोकतंत्र की आत्मा खतरे में पड़ जाएगी। आइए, इस मंच को जीवंत रखें और सच को सामने लाएँ। जय हिन्द!
आपका दोस्त,
रजनी कांत

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